कौन थे राणा सांगा? जिनको लेकर मचा है इतना बवाल

1482 में जन्मे संग्राम सिंह (राणा सांगा) मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के थे। बचपन से ही वीरता और युद्ध कौशल में निपुण, उन्होंने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा का परिचय दिया

1508 में पिता राणा रायमल की मृत्यु के बाद, संग्राम सिंह ने 'राणा सांगा' के नाम से मेवाड़ की गद्दी संभाली और राजपूत शक्ति को एकजुट करने का संकल्प लिया

राणा सांगा ने सभी राजपूत वंशों—सिसोदिया, राठौर, कछवाहा—को एकजुट किया और मुस्लिम सल्तनतों के खिलाफ एक शक्तिशाली गठबंधन बनाया।

इब्राहिम लोदी को खातोली के युद्ध में हराकर राणा सांगा ने अपनी वीरता साबित की। इस जीत ने उन्हें 'हिन्दूपत' (हिंदुओं का रक्षक) की उपाधि दिलाई

1527 में, मुगल बादशाह बाबर से खानवा के युद्ध में राणा सांगा ने बहादुरी से लड़ा, परंतु आधुनिक तोपखाने के आगे राजपूतों की हार हुई

80 से अधिक घावों, एक आँख और एक हाथ खोने के बावजूद राणा सांगा युद्ध में डटे रहे। उनकी वीरता ने इतिहास में अमर पहचान बनाई।

राणा सांगा की मृत्यु के बाद भी उनकी वीरता की गाथाएँ गूँजती रहीं। महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं ने उनके सपने को आगे बढ़ाया।

राणा सांगा ने अपने खून से मेवाड़ की माटी को लाल किया, परंतु उनका साहस और बलिदान भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा।